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Tuesday, November 15, 2011

देवता से लगते सबको ,गर नाक सीधी होती तुम्हारी (हास्य-प्रेरणास्पद कविता)


ना करो बुराई 
किसी की
ना दिखाओ आइना
गर कह दिया किसी को
नाक टेढ़ी उसकी
हो जाएगा नाराज़ तुमसे
फिर भी रह ना पाओ
कहना चाहो
तो समझ लो कैसे कहो
नाक टेढ़ी उसकी
ललाट चौड़ा ,काया 
कंचन सी
केश काले ,रंग गंदुमी ,
चाल ढाल राजाओं की
चेहरा अभिनेताओं सा
लगता तुम्हारा
देवता से लगते सबको
गर नाक सीधी होती 
तुम्हारी
(काने को काना मत कहो
काना जाएगा रूठ
बस चुपके से पूछ लो
कैसे गयी थी फूट )
15-11-2011
1791-62-11-11
{शारीरिक कमी,कुदरत की देन होती है,इस पर कटाक्ष करना उचित नहीं  }

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