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Wednesday, August 22, 2012

जीवन की भट्टी में



जीवन की भट्टी में मन
अब तेज़ आंच
पर चढी कढाई सा
हो गया है
विचार इस हद तक
उबलने लगे हैं
सब्र का पानी उफन रहा है
सब कुछ अस्त व्यस्त
करने के कगार पर
बेताबी से खडा है
इतनी उथल पुथल अब
ह्रदय से सही नहीं जाती
जिधर भी दृष्टि उठाता हूँ
सिवाय तनाव के
कुछ नज़र नहीं आता
ठहाके लगाते लोग,
बाहों में बाहें डाले दोस्त
अब गिद्ध जैसे
लुप्त होते जा रहे
इर्ष्या-द्वेष ,होड़ का राक्षस
अट्टाहास कर रहा
शोर भरे जीवन में
लगने लगा है
अपने पराये में कोई
फर्क नहीं रहा
कोई किसी को सुनना
समझना नहीं चाहता
अपनी अपनी तूतीं
बजाना चाहता
निरंतर स्वार्थ में जीता
अहम् को
सफल जीवन का सूत्र
समझता
21-08-2012
663-23-08-12

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