Friday, November 18, 2011

सलाह


सलाह 
सदा उचित देनी 
चाहिए 
कोई नहीं माने तो 
व्यथित नहीं होना 
चाहिए
समय आने पर 
जिसे सलाह दी गयी 
अवश्य याद करेगा
17-11-2011-29
डा राजेंद्र तेला,"निरंतर

Thursday, November 17, 2011

शक्ती



अपनी शक्ती को पहचानें 
उसके अनुरूप 
कार्य या व्यवहार करें 
जो दूसरों को अभिभूत करे 
अपनी कमज़ोरी को जाने 
उसके अनुरूप 
कार्य या व्यवहार ना करें 
असफलता मिलेगी 
अंग्रेज़ी भाषा में इसे कहूंगा 
Work according to your strength
Not according to your weakness
17-11-2011-28
डा राजेंद्र तेला,"निरंतर

Tuesday, November 15, 2011

विचारों का प्रवाह


विचारों का प्रवाह
मनुष्य के मष्तिष्क की
एक सामान्य प्रक्रिया है
पर सद विचार ही आयें,
उसके लिये सत्संग आवश्यक है .
सद विचार रखने वाले लोग
आपको निरंतर सद विचारों के प्रति
प्रोत्साहित करेंगे .
साथ ही विचारों के प्रवाह को
नियंत्रित करना भी अति आवश्यक है
अवांछनीय विचार मष्तिष्क में आते ही
उन्हें परिष्कृत करना भी सीखना चाहिए.
तत्काल कुछ और कार्य में अपने को
तल्लीन करना चाहिए
24-10-2011
1702-109-10-11-27
डा राजेंद्र तेला,"निरंतर

विश्वास


एक ऐसा शब्द जो हम निरंतर सुनते हैं ,
जिस के बिना मनुष्य का जीवन नहीं चलता,
विश्वास दो व्यक्तियों या व्यक्तियों के बीच
संबंधों की धुरी के सामान होता है.
संबंधों का बनना,बिगड़ना
परस्पर विश्वास पर ही निर्भर करता है.
विश्वास नहीं होता तो विश्वासघात भी नहीं होता .
ध्यान रखने योग्य प्रमुख बात है,
विश्वास कभी एक पक्षीय नहीं हो सकता.
सदा द्वीपक्षीय होता है.
विश्वास पाने के लिए विश्वास करना भी
उतना ही आवश्यक है,
साथ ही मर्यादाहीन,
अवांछनीय कार्यों और व्यवहार के लिए
किसी से विश्वास की अपेक्षा करना,
निरर्थक होता है.
डा राजेंद्र तेला,"निरंतर
25-10-2011-26

धन और गुण


धन से अच्‍छे गुण नहीं मिलते,
धन अच्‍छे गुणों से मिलता है !
-सुकरात
महान दार्शनिक सुकरात के समय में यह कथन उचित रहा होगा .
आज के समय में मेरा मानना है 
धन का सम्बन्ध अच्छे  गुणों से नहीं होता ,
वरन धन आज के समय में 
अधिकतर अवांछनीय तरीकों से कमाया जाता है 
या कहिये धन कमाने का व्यक्ती के गुणों  से कोई सम्बन्ध नहीं होता
अच्छे गुण किसी भी धन से अधिक होते हैं
08-11-2011
1759-27-11-11-25
डा राजेंद्र तेला,"निरंतर

स्त्री बल


अधिकतर पुरुष वर्ग समझता है,
स्त्रियाँ निर्बल होती हैं,
वास्तविकता इसके विपरीत है,
शारीरिक बल स्त्रियों का कम हो सकता है
पर आत्मिक बल अधिक होता है,
सहने और करने की शक्ती भी अधिक होती है,
जो त्याग और बलिदान स्त्रियाँ करती हैं ,
उसकी अनदेखी होती रही है.
दुःख है की,पुरुष प्रधान समाज
इस कटु सत्य को नज़रंदाज़ करता रहा है.
08-11-2011
1760-28-11-11-24
डा राजेंद्र तेला,"निरंतर

सच्चा ज्ञान क्या है ?


ग्रंथों में एवं महापुरुषों ने जो कहा पढ़ कर ,
अथवा अपने अनुभव और विवेक के अनुसार सच्चे ज्ञान पर
अपने विचार प्रकट करना आसान लगता है
मनुष्य समझता है उसे सच्चे ज्ञान का पता चल गया .
लेकिन प्रश्न है ,कौन तय करता है ,सच्चा ज्ञान क्या है ?
संभवतनिश्छल,निर्विकार,निष्पक्ष,निष्कपट जीवन जीने से,
परमात्मा में आस्था रखने एवं उसके मार्ग पर चलने से ही
सच्चे ज्ञान का अनुभव होता होगा.
08-11-2011
1761-29-11-11-23
डा राजेंद्र तेला,"निरंतर

पूजा-अर्चना


संसार का सृजन करने वाले  एवं उसे चलाने वाले परमात्मा को भिन्न नामों से पुकारा जाता है अपनी अपनी आस्था और धर्म के अनुसार  राम ,कृष्ण,शिव,जीसस क्राइस्ट,पैगम्बर मोहम्मद,गुरु नानक,गौतम बुद्ध ,महावीर ,जोराष्ट्र ,भिन्न भिन्न सम्प्रादायों के गुरुओं आदि के नामों से धर्मावलम्बी उन्हें याद करते उनका नमन व् अपने धार्मिक मूल्यों एवं आस्था के अनुसार
उनकी पूजा करते हैं एवं सम्मान प्रकट करते है
पर पूजा,अर्चना अर्थ हीन हो जाती है अगर हम उनके बताये रास्ते पर नहीं चलते .
हमारे कार्य कलापों एवं व्यवहार में उनके द्वारा दी गयी शिक्षा अगर परिलक्षित नहीं होती हो तो ये अधर्म कहलायेगा
अपने ईश या इष्ट को प्रसन्न करने के लिए पूजा ,अर्चना से अधिक आवश्यक है,उनके द्वारा स्थापित मूल्यों एवं सत्य मार्ग पर चलना .
अन्यथा पूजा,म्रत्यु और अनहोनी से बचने के लिए  उन्हें याद करने से अधिक नहीं होती है.
मात्र दिखावा भर रह जाती है और स्वयं को धोखा देने के सामान होती है
संसार का सृजन करने वाले एवं उसे चलाने वाला परमात्मा अगर है ,तो ध्यान रहना चाहिए वो सब देखता है
ऐसा कार्य या व्यवहार जो उसे मान्य नहीं है ,उसकी दृष्टि से छुपा नहीं रहता
15-11-2011-22
डा राजेंद्र तेला,"निरंतर

परिवेश


एक परिवेश सबके के लिए अच्छा हो ऐसा आवश्यक नहीं है
भिन्न मानसिकताएं और भिन्न विचार परिवेश को भिन्न भिन्न तरीके से देखेंगी
महत्वपूर्ण वह है ,परिवेश ,आपके अनुकूल नहीं होने पर बिना संयम खोये ,
सब्र के साथ उसको सहना और बिना थके बदलने का प्रयत्न करना आवश्यक है ,

15-11-2011-21
डा राजेंद्र तेला,"निरंतर

कितना क्रोध उचित है


सच में हर ज्ञानी,महापुरुष ने सदा एक ही बात कही है
क्रोध नहीं करना चाहिए .
ग्रन्थ साक्षी हैं ,देवताओं से लेकर महापुरुष,योगी और महाऋषी भी क्रोध से नहीं बच सके .
क्रोध मनुष्य के स्वभाव का अभिन्न अंग है.
परमात्मा द्वारा दी हुयी इस भावना का अर्थ असहमती की अभिव्यक्ति ही तो है
पर उस में विवेक खोना ,जिह्वा एवं स्वयं पर से नियंत्रण खोना घातक होता है.
इसकी परिणीति अनयंत्रित व्यवहार और कार्य में होती है .जिस से बहुत भारी अनर्थ हो सकता है ,सब को निरंतर ऐसा होते दिखता भी है.
अतः क्रोध करना अनुचित तो है ही ,पर साथ में क्रोध आने पर,अपना विवेक बनाए रखना,जिह्वा और मन मष्तिष्क पर नियंत्रण अत्यंत आवश्यक है.
असहमती अवश्य प्रकट करनी चाहिए पर विवेक पूर्ण तरीके से .
15-11-2011-20
डा राजेंद्र तेला,"निरंतर

समय की चिंता


हम समय की चिंता करते हैं
समय हमारी चिंता नहीं करता ।
15-11-2011-19
डा राजेंद्र तेला,"निरंतर

सहायता


सहायता मांगने पर
सहायता करने वाले का
धन्यवाद देना भी
उतना ही आवश्यक है
जितना करना या मांगना
15-11-2011-19
डा राजेंद्र तेला,"निरंतर

पसंद


आपकी पसंद ही श्रेष्ठ है
ऐसा सोचना उचित नहीं है
ऐसा मानना उसी प्रकार है
जैसे किसी को
अनार पसंद हो और वो कहे
अनार ही श्रेष्ठ फल है
आम,चीकू ,संतरा इत्यादी
अच्छे  नहीं होते
15-11-2011-18
डा राजेंद्र तेला,"निरंतर

देवता से लगते सबको ,गर नाक सीधी होती तुम्हारी (हास्य-प्रेरणास्पद कविता)


ना करो बुराई 
किसी की
ना दिखाओ आइना
गर कह दिया किसी को
नाक टेढ़ी उसकी
हो जाएगा नाराज़ तुमसे
फिर भी रह ना पाओ
कहना चाहो
तो समझ लो कैसे कहो
नाक टेढ़ी उसकी
ललाट चौड़ा ,काया 
कंचन सी
केश काले ,रंग गंदुमी ,
चाल ढाल राजाओं की
चेहरा अभिनेताओं सा
लगता तुम्हारा
देवता से लगते सबको
गर नाक सीधी होती 
तुम्हारी
(काने को काना मत कहो
काना जाएगा रूठ
बस चुपके से पूछ लो
कैसे गयी थी फूट )
15-11-2011
1791-62-11-11
{शारीरिक कमी,कुदरत की देन होती है,इस पर कटाक्ष करना उचित नहीं  }

Monday, November 14, 2011

दृढ रहना

समय काल और प्रचलित
मान्यताओं से लड़ने वाला
साहसी और विद्रोही 
कहलाता है 
उसका दृढ रहना भी
अत्यावश्यक है ,
क्योंकि उसका विरोध
भी निश्चित है
14-11-2011-17
डा राजेंद्र तेला,"निरंतर

सत्य बोलने का अर्थ


सत्य बोलने का एक अर्थ है
स्वयं का आवरण हटाने का संघर्ष
23-06-2011
डा राजेंद्र तेला,"निरंतर"

मित्र


मित्र एक 
आदर्श भ्राता होता है.
जो कभी 
छोटे कभी बड़े भ्राता का
कर्तव्य निभाता है 
वो इंसान भाग्यशाली है
जिसका कोई 
सच्चा मित्र होता है
सच्चा मित्र ही आपको
आपके सत्य से
अवगत करा सकता है
संत सिद्धार्थ ने कहा है
"सच्चा मित्र वही है,
जो भरपूर ईमानदारी से
आपके अहंकार को 
ठेस पहुँचाएं
फिर भी आप 
उसके साथ के लिये
अपने अंतर्मन में
इच्छा को जिंदा पाएं
बाकी सब तरह की मित्रताएं
अवसरवादी,सतही एवम
कम आयु की होती हैं"
डा.राजेंद्र तेला "निरंतर"
22-06-2011

समस्या


समस्या तभी पैदा होती है जब दिनचर्या का महत्त्व ज्यादा हो जाता है सोच नेपथ्य में रह जाता है, धीरे धीरे खो जाता है, केवल भ्रम रह जाता है भौतिक सुख, अपने से ज्यादा" लोग क्या कहेंगे "की चिंता प्रमुख हो जाते हैं आदमी स्वयं, स्वयं नहीं रहता कठपुतली की तरह नाचता रहता, जो करना चाहता, कभी नहीं कर पाता, जो नहीं करना चाहता, उसमें उलझा रहता, जितना दूर भागता उतना ही फंसता जाता।
भारत कोष, में अनमोल वचन ,प्रष्ठ संख्या ९ में प्रकाशित
(Bharat Discovery)
- डा.राजेंद्र तेला,"निरंतर"

अनुसरण


मनुष्य निरंतर दूसरों का अनुसरण करता है, उनके जीवन से प्रभावित हो कर या उनके कार्य कलापों से प्रभावित होता है अधिकतर अन्धानुकरण ही होता है। क्यों किसी ने कुछ कहा? किन परिस्थितियों में कुछ करा या कहा कभी नहीं सोचता। परिस्थितियाँ और कारण सदा इकसार नहीं होते, महापुरुषों का अनुसरण अच्छी बात है फिर भी अपने विवेक और अनुभव का इस्तेमाल भी आवश्यक है। यह भी निश्चित है जो भी ऐसा करेगा उसे विरोध का सामना भी करना पडेगा। उसे इसके लिए तैयार रहना पडेगा। अगर ऐसा नहीं हुआ होता तो केवल मात्र एक या दो ही महापुरुष होते। नया कोई कभी पैदा नहीं होता। इसलिए मेरा मानना है जितना ज़िन्दगी को करीब से देखोगे। अपने को दूसरों की स्थिती में रखोगे तो स्थितियों को बेहतर समझ सकोगे, जीवन की जटिलताएं स्वत: सुलझने लगेंगी।
भारत कोष, में अनमोल वचन ,प्रष्ट संख्या ९ में प्रकाशित
(Bharat Discovery)
- डा.राजेंद्र तेला,"निरंतर"

विपत्ती के समय


विपत्ती के समय में इंसान विवेक खो देता है, स्वभाव में क्रोध और चिडचिडापन आ जाता है। बेसब्री में सही निर्णय लेना व उचित व्यवहार असंभव हो जाता है। लोग व्यवहार से खिन्न होते हैं, नहीं चाहते हुए भी समस्याएं सुलझने की बजाए उलझ जाती हैं जिस तरह मिट्टी युक्त गन्दला पानी अगर बर्तन में कुछ देर रखा जाए तो मिट्टी और गंद पैंदे में नीचे बैठ जाती है, उसी तरह विपत्ती के समय शांत रहने और सब्र रखने में ही भलाई है। धीरे धीरे समस्याएं सुलझने लगेंगी एक शांत मष्तिष्क ही सही फैसले आर उचित व्यवहार कर सकता है।
भारत कोष, में अनमोल वचन ,प्रष्ट संख्या ९ में प्रकाशित
(Bharat Discovery)
- डा.राजेंद्र तेला,"निरंतर"

प्रशंसा


प्रशंसा
प्रशंसा सब को अच्छी लगती है,शायद ही कोई होगा जिसे प्रशंसा सुनना अच्छा नहीं लगता है, प्रशंसा आवश्यक है, अच्छे कार्य की प्रशंसा नहीं करना अनुचित है, पर ये कतई आवश्यक नहीं है, कि अच्छा करने पर ही प्रशंसा की जाए, प्रोत्साहन के लिए साधारण कार्य की प्रशंसा भी कई बार बेहतर करने को प्रेरित करती है,पर देखा गया है लोग झूंठी प्रशंसा भी करते हैं, खुश करने के लिए ,कडवे सत्य से बचने के लिए या दिखावे के लिए। पर इसके परिणाम घातक हो सकते हैं। व्यक्ति सत्य से दूर जा सकता है, एवं वह अति आत्मविश्वाश और भ्रम का शिकार हो सकता है, जो घातक सिद्ध हो सकता है। वास्तविक स्पर्धा में वह पीछे रह सकता है या असफल हो सकता है इसलिए प्रशंसा कब और कितनी करी जाए, यह जानना भी आवश्यक है। साथ ही झूंठी प्रशंसा को पहचानना भी आवश्यक है। इसलिए सहज भाव से संयमित प्रशंसा करें, और सुनें, प्रशंसा से अती आत्मविश्वाश से ग्रसित होने से बचें। प्रशंसा करने में कंजूसी भी नहीं बरतें।
भारत कोष, में अनमोल वचन ,प्रष्ट संख्या ९ में प्रकाशित
(Bharat Discovery)
- डा.राजेंद्र तेला,"निरंतर"